डॉन रिपोर्टर, उज्जैन।
जहरीली शराब पीने से हुई 14 मौतों के मामले की एसआईटी जांच कर रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर ये उच्च स्तरीय अधिकारियों की टीम भोपाल से आई है। अब तक इस मामले में पुलिस के एक टीआई व 4-6 कांस्टेबलों पर सस्पेंड की गाज गिरी है।
अब इन्हीं में से मीडिया रिपोर्ट के दबाव से 2-3 कांस्टेबलों पर एफआईआर दर्ज किए जाने की तैयारी की जा रही है। निश्चित तौर पर इस प्रकरण में कांस्टेबलों की लापरवाही मानी जा सकती है लेकिन यहां सवाल ये खड़ा होता है कि क्या किसी टीआई की इतनी मजाल हो सकती है कि वह बगैर एसपी को संज्ञान में लिए थाने या क्षेत्र में एक पत्ता भी हिला सके या फिर किसी कांस्टेबल की इतनी बिसात है कि वह बिना टीआई की सहमति से इलाके में घूमकर 50 ग्राम मूंगफली भी मुफ्त में खा सके। हां इतना जरूर है कि टेबल पत्रकारिता और कानाफूसी जर्नलिज्म के दबाव में इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें बलि का बकरा जरूर साबित किया जा सकता है।
यहां एसपी अतुलकर और एसपी प्रताप की प्रशंसा करना बहुत जरूरी
बहुत लंबे समय बाद देखने में आया है कि उज्जैन पुलिस बहुत दवाब में है और पुलिसकर्मियों का मनोबल खासा गिरा हुआ है। इसके पहले उज्जैन पुलिस की इसतरह की हालत तब थी, जब मनोहर वर्मा उज्जैन एसपी थे। उनके कार्यकाल में भी उज्जैन पुलिस फोर्स का मनोबल शून्य से नीचे की ओर चला गया था। उज्जैन जिले के इतिहास में संभवतः वे ही पहले ऐसे एसपी होंगे, जो छुटभैये नेताओं को अपने चेम्बर से साथ लेकर बाहर सड़क तक मैजिक या उनके निजी वाहन तक छोड़ने जाते थे। कई मौकों पर वे पास मौजूद टीआई या अन्य पुलिसकर्मी से मांगकर मैजिक का किराया भी छुटभैये नेताओं को देते थे। उज्जैन एसपी रहे सचिनकुमार अतुलकर की कार्यशैली हमने देखी है और धार एसपी आदित्य प्रताप सिंह की कार्यशैली हमने सुनी और पढ़ी है। बतौर उज्जैन एसपी रहते अतुलकर कभी किसी के दबाव में नहीं रहे। वे कभी किसी की कानाफूसी में नहीं आए। बड़े घटनाक्रम पर रात 2 बजे भी यदि उन्हें कॉल किया जाता तो वे उसे रिसीव करते यदि रिसीव नहीं कर पाते तो फिर कॉल बेक करते। यदि घटना को लेकर किसी को कोई कन्फ्यूजन रहता तो वे उसे दुरुस्त करवा देते। इस तरह समाज के भीतर भी सही जानकारी पहुचती। उन्होंने कामचोर पुलिसकर्मियों के नाक में भी नकेल डाल रखी थी। दोषियों को दंडित करने से भी पीछे नहीं हटते। उनके कार्यकाल में शायद सबसे अधिक पुलिसकर्मी सस्पेंड हुए थे लेकिन इन पुलिसकर्मियों को इन्होंने किसी के दबाव में नहीं बल्कि खुद की जांच में दोषी पाए जाने पर सस्पेंड या बर्खास्त किया था। उनके कार्यकाल में गुंडे-बदमाशों के हौसले पस्त हो चुके थे। वहीं पुलिसकर्मियों का मनोबल खासा बड़ा हुआ था। इसीप्रकार धार एसपी आदित्य प्रताप सिंह के बारे में भी सुना जाता है कि यदि उन्हें जानकारी हो जाए कि फलां मामले में फलां पुलिसकर्मी या अधिकारी का कोई दोष नहीं है। फिर भले ही कोई कितना दवाब बना ले, वे अपने फोर्स का बाल भी बांका नहीं होने देते। इसलिए उज्जैन में बने इस हालात के दृष्टिगत आईपीएस सचिन अतुलकर व आईपीएस आदित्य प्रताप सिंह की प्रशंसा करना बहुत जरूरी है।
इसे ऐसे समझे जहरीली शराब से 14 मौतों में ये हैं सबसे अधिक जिम्मेदार
आबकारी विभाग- इन 14 मौतों में सबसे अधिक जिम्मेदार है तो वह है आबकारी विभाग। आबकारी विभाग के पास सिर्फ एक ही जिम्मेदारी रहती है कि शराब के वैध-अवैध कारोबार पर नजर रखना। इस मामले में तो जहरीली शराब बनाई जा रही थी। ऐसा हो ही नहीं सकता कि जिले में वैध-अवैध या जहरीली शराब बनाई जाए और इसकी जानकारी आबकारी विभाग को न हो। यदि वाकई में आबकारी विभाग को कोई जानकारी नहीं थी तो सबसे अधिक जिम्मेदार मानते हुए पूरे विभाग को ही बर्खास्त कर सरकारी वेतन का खर्च बचाया जाए।
नगर निगम- जिस रीगल टॉकीज की छत पर जहरीली शराब की फैक्टरी लगाई गई थी। वह जर्जर बिल्डिंग नगर निगम के अधीन है। इस बिल्डिंग में जहरीली शराब की फैक्टरी निगमकर्मियों ने ही लगाई थी। ये निगमकर्मी जिन अधिकारी के अंडर में होंगे या फिर जो उक्त बिल्डिंग या जोन का प्रभारी हैं। वे भी जहरीली शराब से 14 मौतों में सबसे अधिक जिम्मेदार है।
पुलिस- इस प्रकरण में पुलिस को जिम्मेदार नहीं बल्कि लापरवाह माना जा सकता है। क्योंकि शराब के मामले में नियंत्रण रखने के लिए ही आबकारी विभाग बनाया गया है और जिस बिल्डिंग में जहरीली शराब की फैक्टरी लगाई गई थी वह नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में है। हां ये फैक्टरी सरकारी आधिपत्य क्षेत्र में न होकर निजी बिल्डिंग में लगाई जाती तब ऐसी स्थिति में पुलिस पर दोषी मानी जा सकती थी लेकिन फिर भी शराब व ड्रग के मामले में सबसे अधिक जिम्मेदार आबकारी व ड्रग विभाग ही माने जाएंगे।